हाँ मैंने माना, मैं तुम जैसी नहीं

मैं तुम जैसी नहीं

गलत को कहूँ गलत, कहूँ सही को सही,

हाँ मैंने माना, मैं तुम जैसी नहीं

मन में जो मेरे बात है, है जुंबा पर वही,

हाँ मैं फिर से कहती हूँ, के मैं तुम जैसी नहीं

ना किसी से आगे जाने की होड़, न करना किसी का पीछा,

पर छोडू न उसको मैं कभी भी, जो दिखलाये मुझको नीचा

दूं मैं हौसला उन सभी को, जिनका मन है कच्चा,

पर माफ़ न करती उसको, जिसने पैर मेरा खींचा

है स्वयं से मेरी प्रतिस्पर्धा, चाहूं खुद की बेहतरी,

हाँ मैंने माना के मैं, तुम जैसी नहीं

न दिखावा मुझे पसंद, न ही देख के कुछ ललचाती,

पास रखूं बस वही, जो मेरे मन को भाती

तेरी अच्छाई तो सीख लूं, पर बुरे काम ना मैं अपनाती

मेरे माता-पिता और आत्मा की सीख ही मुझे मेरी राह दिखाती

मेरे मजबूत इरादों के आगे, तुम्हारी बुरी कामनाएं रह जाएँगी धरी,

हाँ मैंने माना के मैं तुम जैसी नहींl

कोई जो चाहे करे मुझे स्वीकार है,

पर उसमे जो निहित हो बुरा मेरा, तो मुझे अस्वीकार है

अपनी हद में रहना मेरा तो स्वभाव है,

दूसरे को उसकी हदें समझाना भी मेरा अधिकार है

अपने वजूद की रक्षा मैंने जग से लड़के भी करी

हाँ मैंने माना के मैं तुम जैसी नहींl

जो दो कदम तुम प्यार से बढ़ाओ, मैं सौहार्द के बढ़ाउंगी

जो तुम दिखाओ अहंकार, मैं अपनी राह ही मोड़ जाउंगी,

जो जैसा कर रहा मेरे साथ, उसे वैसा ही लौटाउंगी

जो सम्मान तुम मुझे न दे सके, वो मैं भी भला तुम्हें कैसे दे पाऊँगी,

जैसे को तैसी हूँ, मुझे चापलूसी नहीं लगती सही

हाँ मैंने माना के मैं तुम जैसी नहींl

ना रोकती ना टोकती , ना फ़ालतू किसी को कोसती

दुनिया के हर रिश्ते में ढूंढती हूँ दोस्ती,

न पसंद मुझे अनावश्यक दखल किसी का, ना मैं अपनी मर्जियां दूसरों पे थोपती

जो कर न सकूं किसी के लिए, स्वयं के लिए उनसे उम्मीद भी नहीं पोसती,

हर किसी की स्वतंत्रता का सम्मान करती रही

हाँ मैंने माना के मैं तुम जैसी नहींl

कड़वा सच कहती हूँ, नहीं मैं मीठी छुरी,

चार लोगों की परवाह नहीं मुझे, रहूँ अपनी नजरों में ही खरी,

अभिमान नहीं किसी बात का, स्वाभिमान ही मेरे जीवन की धुरी

दूर ही रहती हूँ उन लोगों से, जिनकी सोच है गिरी,

अलग सोच रखती हूँ, मैं किसी भीड़ का हिस्सा नहीं

हाँ मैंने माना, मैं तुम जैसी नहींl

ये मेरी फितरत नहीं कि, कुछ कहूँ और मुकर जाऊं

ऐसी कोई भूल ना करूँ कि स्वीकार ना पाऊं,

जो हुई एक बार गलती, दोबारा कभी न दोहराऊं

और मेरे सच्चे अपनों को आप खोकर भी मनाऊं,

जहाँ प्रयास हो दोतरफा, हर बात वहीँ पे बनी

हाँ मैंने माना के मैं तुम जैसी नहींl

और अंत में, एक सलाह——-

अपने प्रभाव में रहो, अपने स्वभाव में जियो

जीवन के अमृत को, सिप सिप करके पियो,

न करो ईर्ष्या किसी से, न रखो किसी से बैर

फिर कोई साथ दे या ना दे, वो रब करेगा खैर,

सबकी अपनी सख्सियत, सबके अपने गुण

सम्मान करो सभी का, प्रसन्न रहेगा मनl l

 

 

——प्रिया चौहान

 

 

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