अपना अपना नजरिया

किसी भी एक परिस्थिति में या किसी घटना के विषय में, हर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग – अलग होता है। और कई बार दो लोगों के नजरिये में समानता भी पाई जाती है। वास्तव में हमारे व्यावहार, हमारे व्यक्तित्व तथा हमारे आचरण पर हमारी परवरिश, वातावरण एवम हमारे आस पास के लोगों के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। हम अपनी पहली शिक्षा अपने माता पिता, परिवार और रिश्तेदारों से प्राप्त करते हैं, फिर कुछ आदतें अपने दोस्तों और पडोसियों से सीखते हैं, अपने अध्यापक से और फिर इस समाज से और अंत में अपने हालातों से।। इन सबके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक है, जिसे हम जन्म से प्राप्त करते हैं और वो है हमारी दिमागी क्षमता।

कुछ लोग अपने मस्तिष्क के स्वामी होते हैं, और कुछ लोगों का स्वामी उनका मष्तिष्क होता है। जो व्यक्ति अपने मष्तिष्क का स्वामी है, वह समझदार है, जीवन की वास्तविकता को समझता है , अत्यंत भावुक न होकर स्पष्ट और दृढ विचारों वाला है, किसी कठिन परिस्थिति में संयम नहीं खोता है और सबसे महत्वपूर्ण प्रत्येक व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करता है। उसके विचार उच्च हैं और अपने अनुभवों से सीख लेता है। वह सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है । वहीं दूसरी ओर, जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क (मन या सोच) के अधीन है, वह अहंकारी है , वो सिर्फ अपनी भावनाओं के अधीन है उसे परिवर्तन से डर लगता है, और वह अपना अधिकांश जीवन अपनी नकारात्मक कल्पनाओं में ही व्यतीत कर देता है। वह जीवन के विभिन्न पहलुओं का अनुभव न करके सिर्फ कुछ सीमा रेखाओं में कैद होकर जीना पसंद करता है। वह नकारात्मक दृष्टिकोण का स्वामी है।

एक श्रेणी और भी है जिसमें व्यक्ति का पास अच्छी मानसिक क्षमता भी है, किन्तु वे उसका प्रयोग नहीं करना चाहते। तर्क वितर्क वे सिर्फ अपनी जरूरतों के हिसाब से करते हैं। ये दूसरों के कन्धों पर बन्दूक रख कर चलाते हैं। सही और गलत में भेद ये सिर्फ तभी करते हैं, जब इनका अहित हो रहा हो।। कान क कच्चे होते हैं, और सच मानिये ये श्रेणी अत्यंत चतुर लोगों की है, जो निज स्वार्थ के लिए गलत कार्यों को बढ़ावा देते हैं। इनका दृष्टिकोण इनकी जरूरतों के अनुसार बदलता रहता है।

आइये दृष्टिकोण की इस भिन्नता को एक उदहारण से समझते हैं। आपने वो उदाहरण तो सुना ही होगा कि सकारात्मक व्यक्ति को आधा भरा गिलास दीखता है, और नकारात्मक व्यक्ति को आधा खाली गिलास दिखता है। परन्तु जिन लोगों का अपना कोई मत नहीं है, उसका कथन कुछ इस प्रकार होगा कि गिलास का डिजाईन बहुत अच्छा है। अर्थात उन्हें वास्तविक मुद्दे में कोई रूचि नहीं और वो अपने बयान से किसी एक पक्ष का समर्थन भी नहीं करना चाहते, क्यूंकि वो अपने स्वार्थ के अनुसार चयन करते हैं कि किसके दृष्टिकोण को प्राथमिकता देनी है।

दृष्टिकोणों की विभिन्नता

क्या आपने कभी गौर किया है कि एक ही माता पिता की संतानों की भी  खेल सम्बन्धी, पढाई सम्बन्धी, व्यवसाय सम्बन्धी और अनेक क्षेत्रों में रुचियाँ भिन्न होती हैं। जबकि उनको एक जैसा खान पान और वातावरण मिलता है। जी हाँ उनकी बौद्धिक क्षमताएं भिन्न भिन्न होती हैं जिनके आधार पर आपकी उम्मीदें , आपका व्यवहार, पढाई सम्बंधित सुविधायें और उन्हें सौंपी जाने वाली जिम्मेदारियां भी समयानुसार बदलती रहती हैं, और इन्ही परिवर्तनों के अनुसार उनका दृष्टिकोण भी अलग अलग हो जाता है।

उसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति अपने माता पिता व रिश्तेदारों के विषय में बात करता है तो बहुत ही नरम रुख अपनाता है, किन्तु वहीं जब बात उसकी पत्नी के माता पिता की हो तो रुख सख्त हो जाता है। क्यूंकि हम सभी के माता पिता हमे बड़े नाजों से पालते हैं, हमारे हर नखरे को उठाते हैं, अपने खर्चों में कटौती करके हमारे खर्चे पूरे करते हैं। इसलिए यदि वे कभी कहीं पर गलत भी होते हैं, तो हम उनके प्रति नरम हो जाते हैं, किन्तु दूसरों के मामले में हम उस त्याग की भावना को समझ नहीं पाते। ठीक उसी तरह माता पिता भी अपने बच्चों में गलतियाँ नहीं ढूंढ पाते या उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। किन्तु अपनी बहू और दामाद को आढे हाथों ले लेते हैं, या उन्हें बच्चा न समझकर अपना प्रतिद्वंदी समझ लेते हैं। कोई भी किसी को समझना नहीं चाहता, या यूं कहें के कोई भी किसी दूसरे के नजरिये को महत्व नहीं देना चाहता, बस अपने दृष्टिकोण को दूसरों पर थोप देना चाहता है।

विभिन्न दृष्टिकोणों की वजह से विचारों की असमानता लगभग प्रत्येक घर में कलेश का कारण है। हमे हर किसी के मत को महत्व देना सीखना चाहिए। हर व्यक्ति के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। समस्याएँ व झगडे हर पति पत्नी में समान हैं, किन्तु प्रेम विवाह करने वालों पर कटाक्ष करना आसान लगता है, क्यूंकि उन्होंने अपने मतानुसार निर्णय ले लिया, इसलिए उनके सम्पूर्ण अधिकार समाप्त हो गयेन। पर क्या सच में?

हर व्यक्ति का ज़िन्दगी के प्रति नजरिया अपनी वर्तमान परिस्थितियों पर निर्भर होता है। और उन्ही के अनुसार वे दूसरों को जज करते हैं, व सलाह देते हैं। कभी कभी अनजाने में ही वे उन्हें दुःख भी पहुंचा देते हैं। बेहतर यह है कि स्वयं से ऊपर उठकर कभी दूसरों की परिस्थितियों को समझें, अपना निर्णय देने से पूर्व  स्वयं को उनकी जगह पे रखकर देखिये, सही गलत खुद ही समझ में आ जायेगा।

ऐसे बहुत से उदाहरण हमारे समाज में मौजूद हैं जहाँ स्वतंत्र नागरिक होने के बाद भी हम अपने दृष्टिकोण से इस दुनिया को नहीं देख सकते हैं, जो बिलकुल गलत है। यदि सबकी सोच के नजरिये समान हो जायेंगे, तो नयी विचारधारा कभी आ ही नहीं पायेगी कोई सामाजिक सुधार भी नहीं हो पायेगा, और न ही कोई नया आविष्कार। तो जीवन को नवीन अनुभवों से ओत-प्रोत रखने के लिए दूसरों के द्रष्टिकोण को समझें।

 

 

 

 

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